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: रिक्शा चलवाने वाले के बेटे बने IAS

: एक ही चप्पल में सालों तक रहे

: जमीन बेचकर पिता ने पढ़ाई कराई

जब मन में कुछ कर गुजरने की इच्छा होती है तो गरीबी भी सहयोगी बन जाती है. तब इन्सान गरीबी से निकलने की कोशिश करने में अपना पूरा उर्जा लगा देती है. आज की कहानी गोविन्द जैसवाल की है. यक़ीनन वो अपने पढाई के दौरान गरीब थे लेकिन उन्होंने अपने गरीबी को मिटा कर बाहर निकलने की ठान ली थी.

IAS Govind Jaiswal Uttar Pradesh के Varanasi शहर से ताल्लुकात रखते है. उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था. उनके पिता Narayan एक राशन दुकान में काम करते थे. जब परिवार का खर्च राशन की दुकान से पूरा नहीं हुआ तो वो साथ ही कुछ रिक्शा भी चलवाते चलवाने लगे थे.

घर की माली हालत बहुत खराब थी. आमदनी इतनी कम थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता था. Govind बचपन से ही बहुत होशियार थे. लेकिन उनके पास अच्छे कपड़े नहीं थे. उन्होंने कई सालों तक एक ही चप्पल पहनकर स्कूल और कोचिंग की.

गरीबी से डर नहीं बल्कि ताकत मिली

Govind को पता था कि गरीबी उनका भविष्य तय नहीं कर सकती. वह हर दिन किताबों में डूबे रहते थे. दूसरे बच्चे जब खेलते थे तब वह पढ़ाई करते थे. दुसरे बच्चे जब दुकान पर हसी मजाक करते तो गोविन्द पढाई में मन लगाते. अपना समय इधर उधर बर्बाद नहीं करते.

उन्होंने अपने पिता को हमेशा से अपना आदर्श माना था. वो हमेशा अपने घर में देखते की कैसे पिता जी घर चलाते है. उनके पिता ने भी उनका साथ दिया. जब Govind ने UPSC की तैयारी करने का फैसला किया तो पिता ने जमीन बेच दी. वह जानते थे कि जमीन से भी बड़ा बेटे का सपना है.

पिता ने फैसला किया की अब गोविन्द पढने के लिए दिल्ली जायेंगे. उन्होंने बेटे को Delhi भेजा. वहां Govind ने बहुत कठिन हालात में पढ़ाई की. किराए का कमरा छोटा था. उनके पास ज्यादा किताबें नहीं थी. लेकिन कुछ किताब की मदद से ही उन्होंने अपना पढाई का कांसेप्ट पूरा मजबूत कर लिया था.

जब लोग UPSC की तैयारी करते है तो उनके सामने कई चुनौती आती है. किसी का कोई खास विषय कमजोर होती है तो किसी का मजबूत. IPS अनुराग आर्य को हमेशा इंग्लिश से डर लगता था. लेकिन फिर भी वो IPS बन गए थे. उनके रूम में गर्मियों में पंखा भी नहीं होता था. लेकिन Govind ने हिम्मत नहीं हारी.

पहले प्रयास में मिली बड़ी सफलता

साल 2006 में उन्होंने UPSC की परीक्षा दी. यह उनका पहला प्रयास था. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 22 साल थी. इतने कम उम्र में उन्होंने देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर ली. उन्होंने 48वीं रैंक हासिल की. वह IAS बन गए. जब यह खबर घर पहुंची तो मां की आंखों में आंसू थे. पिता की मेहनत रंग लाई थी.